थायरॉइड सर्जरी के बाद रेडियोधर्मी आयोडीन थेरेपी कब दी जाती है?

Dr. Nikunj Jain
2 min read
थायरॉइड सर्जरी के बाद रेडियोधर्मी आयोडीन थेरेपी कब दी जाती है?

थायरॉइड कैंसर के इलाज में कई मरीजों की सर्जरी की जाती है। कुछ मरीजों में पूरी थायरॉइड ग्रंथि निकाल दी जाती है, जबकि कुछ मामलों में केवल थायरॉइड का एक हिस्सा निकाला जाता है। सर्जरी के बाद एक आम सवाल होता है कि क्या अब रेडियोधर्मी आयोडीन थेरेपी की भी जरूरत होगी? इसका जवाब हर मरीज के लिए एक जैसा नहीं होता। रेडियोधर्मी आयोडीन थेरेपी की जरूरत थायरॉइड कैंसर के प्रकार, उसके आकार, कैंसर के फैलाव, लिम्फ नोड्स की स्थिति और दोबारा कैंसर होने के जोखिम जैसे कई कारणों पर निर्भर करती है। आज की गाइडलाइंस भी कम जोखिम वाले मरीजों में बिना जरूरत रेडियोधर्मी आयोडीन देने से बचने पर जोर देती हैं। रेडियोधर्मी आयोडीन थेरेपी क्या होती है? रेडियोधर्मी आयोडीन थेरेपी में आयोडीन-131 नाम के रेडियोधर्मी पदार्थ का इस्तेमाल किया जाता है। इसे आमतौर पर मुंह से दिया जाता है। थायरॉइड की कोशिकाएं आयोडीन को अपने अंदर लेती हैं, इसलिए आयोडीन-131 शरीर में बची हुई थायरॉइड कोशिकाओं या ऐसे थायरॉइड कैंसर की कोशिकाओं तक पहुंच सकता है जो आयोडीन लेते हैं। इसका उद्देश्य सर्जरी के बाद बची हुई थायरॉइड टिश्यू या कुछ मामलों में शरीर के दूसरे हिस्सों में फैली आयोडीन लेने वाली कैंसर कोशिकाओं को नष्ट करना हो सकता है। क्या हर मरीज को सर्जरी के बाद रेडियोधर्मी आयोडीन दिया जाता है? नहीं। यह समझना बहुत जरूरी है कि थायरॉइड सर्जरी के बाद हर मरीज को रेडियोधर्मी आयोडीन थेरेपी की जरूरत नहीं होती। कम जोखिम वाले कई थायरॉइड कैंसर मरीजों में सर्जरी के बाद केवल नियमित निगरानी और फॉलो-अप पर्याप्त हो सकता है। दूसरी ओर, जिन मरीजों में कैंसर दोबारा होने या शरीर के दूसरे हिस्सों में फैलने का जोखिम अधिक है, उनमें रेडियोधर्मी आयोडीन पर विचार किया जा सकता है। सर्जरी के बाद रेडियोधर्मी आयोडीन कब दिया जा सकता है? डॉक्टर आमतौर पर रेडियोधर्मी आयोडीन की जरूरत का फैसला सर्जरी के बाद मिलने वाली पैथोलॉजी रिपोर्ट और मरीज के जोखिम के आधार पर करते हैं। थेरेपी पर विचार इन स्थितियों में किया जा सकता है:

  • कैंसर के दोबारा होने का जोखिम अधिक हो।

  • कैंसर थायरॉइड से बाहर फैल गया हो।

  • लिम्फ नोड्स में कैंसर पाया गया हो।

  • कैंसर शरीर के दूसरे हिस्सों तक फैल गया हो और वह रेडियोधर्मी आयोडीन लेता हो।

  • सर्जरी के बाद थायरॉइड का कुछ टिश्यू या कैंसर कोशिकाएं बची होने की चिंता हो।

कैंसर का आकार, लिम्फ नोड्स की संख्या, कैंसर का आसपास के टिश्यू में फैलाव और कुछ पैथोलॉजी से जुड़ी विशेषताएं भी फैसला लेने में महत्वपूर्ण हो सकती हैं। किन मरीजों में इसकी जरूरत कम हो सकती है? अगर कैंसर छोटा है, थायरॉइड तक ही सीमित है, सर्जरी से उसे पूरी तरह निकाल दिया गया है और दोबारा होने का जोखिम कम है, तो रेडियोधर्मी आयोडीन की जरूरत नहीं भी हो सकती। 2025 की अमेरिकन थायरॉइड एसोसिएशन गाइडलाइंस में जोखिम के आधार पर इलाज तय करने पर ज्यादा जोर दिया गया है। इसका मतलब है कि सिर्फ कैंसर होने की वजह से हर मरीज को रेडियोधर्मी आयोडीन देना जरूरी नहीं माना जाता। रेडियोधर्मी आयोडीन देने से पहले कौन-कौन सी जांचें होती हैं? थेरेपी का फैसला करने से पहले डॉक्टर मरीज की सर्जरी और पैथोलॉजी रिपोर्ट देखते हैं। इसके अलावा थायरॉइड से जुड़े ब्लड टेस्ट, थायरोग्लोबुलिन और जरूरत के अनुसार इमेजिंग जांच भी की जा सकती हैं। कुछ मरीजों में यह भी देखा जाता है कि कैंसर की कोशिकाएं आयोडीन को ग्रहण कर रही हैं या नहीं। क्योंकि रेडियोधर्मी आयोडीन उन्हीं कोशिकाओं पर प्रभावी होता है जो आयोडीन को अपने अंदर लेती हैं। रेडियोधर्मी आयोडीन थेरेपी कैसे दी जाती है? आमतौर पर रेडियोधर्मी आयोडीन को कैप्सूल या तरल के रूप में मुंह से दिया जाता है। इलाज से पहले डॉक्टर कुछ तैयारी करने के लिए कह सकते हैं। कुछ मामलों में थायरॉइड हार्मोन की दवा को कुछ समय के लिए रोकना या इंजेक्शन के जरिए टीएसएच बढ़ाना जरूरी हो सकता है। थेरेपी के बाद शरीर से रेडियोधर्मी पदार्थ धीरे-धीरे बाहर निकलता है। इसलिए मरीज को कुछ समय के लिए परिवार के सदस्यों, खासकर बच्चों और गर्भवती महिलाओं से दूरी रखने और डॉक्टर द्वारा बताई गई रेडिएशन सेफ्टी सावधानियों का पालन करने की जरूरत हो सकती है। क्या रेडियोधर्मी आयोडीन सुरक्षित है? रेडियोधर्मी आयोडीन कई वर्षों से थायरॉइड कैंसर के इलाज में इस्तेमाल किया जा रहा है। लेकिन इसकी जरूरत, मात्रा और सुरक्षा सावधानियां हर मरीज के अनुसार तय की जाती हैं। इलाज के बाद मुंह का सूखापन, स्वाद में बदलाव या लार से जुड़ी परेशानी जैसे कुछ साइड इफेक्ट हो सकते हैं। इसलिए थेरेपी हमेशा न्यूक्लियर मेडिसिन विशेषज्ञ की सलाह और निगरानी में की जानी चाहिए। डॉ. निकुंज जैन और मॉलिक्यूलर डायग्नोस्टिक्स एंड थेरेपी की भूमिका मॉलिक्यूलर डायग्नोस्टिक्स एंड थेरेपी में थायरॉइड से जुड़ी जांच और न्यूक्लियर मेडिसिन सेवाओं की मदद से मरीज की स्थिति का मूल्यांकन किया जाता है। डॉ. निकुंज जैन, न्यूक्लियर मेडिसिन के विशेषज्ञ, थायरॉइड कैंसर से जुड़े टेस्ट और स्कैन की रिपोर्ट को मरीज की बीमारी, सर्जरी और अन्य मेडिकल जानकारी के साथ समझने में मदद कर सकते हैं। रेडियोधर्मी आयोडीन की जरूरत है या नहीं, इसका फैसला मरीज की व्यक्तिगत स्थिति और कैंसर के जोखिम के आधार पर किया जाता है। फॉलो-अप क्यों जरूरी है? रेडियोधर्मी आयोडीन थेरेपी लेने के बाद भी नियमित फॉलो-अप जरूरी रहता है। डॉक्टर जरूरत के अनुसार थायरोग्लोबुलिन जैसे ब्लड टेस्ट, अल्ट्रासाउंड या अन्य जांचों की सलाह दे सकते हैं। फॉलो-अप का उद्देश्य यह देखना होता है कि इलाज के बाद बीमारी की स्थिति कैसी है और भविष्य में दोबारा कैंसर के कोई संकेत तो नहीं हैं। निष्कर्ष थायरॉइड सर्जरी के बाद रेडियोधर्मी आयोडीन थेरेपी हर मरीज के लिए जरूरी नहीं होती। इसका फैसला कैंसर के प्रकार, आकार, फैलाव, लिम्फ नोड्स, पैथोलॉजी रिपोर्ट और दोबारा बीमारी होने के जोखिम को देखकर किया जाता है। कम जोखिम वाले मरीजों में केवल नियमित निगरानी पर्याप्त हो सकती है, जबकि अधिक जोखिम वाले मरीजों में रेडियोधर्मी आयोडीन महत्वपूर्ण इलाज का हिस्सा बन सकता है। इसलिए सर्जरी के बाद खुद से यह तय करने के बजाय कि रेडियोधर्मी आयोडीन लेना है या नहीं, अपने डॉक्टर और न्यूक्लियर मेडिसिन विशेषज्ञ से सलाह लेना जरूरी है। मॉलिक्यूलर डायग्नोस्टिक्स एंड थेरेपी में डॉ. निकुंज जैन मरीज की जांच रिपोर्ट और मेडिकल स्थिति को समझने में मदद कर सकते हैं, ताकि आगे की जांच और इलाज का फैसला सही तरीके से लिया जा सके।

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